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दुनिया हुई तालिबान की दीवानी! बैंकों से ब्याज खत्म, इस्लामी मॉडल ने मचाया तहलका
अफगानिस्तान में तालिबान सरकार की नई आर्थिक नीति ने पूरी दुनिया को चौंका दिया है। जहाँ एक ओर पश्चिमी देश पारंपरिक बैंकिंग व्यवस्था से जूझ रहे हैं, वहीं तालिबान ने एक ऐसा बैंकिंग सिस्टम लागू किया है जिसमें ब्याज का कोई स्थान नहीं है। इस्लामी वित्तीय मॉडल को अपनाने के बाद से दुनियाभर के अर्थशास्त्री इस प्रयोग पर अपनी नज़रें टिकाए हुए हैं।
क्या है तालिबान सरकार की इस्लामी बैंकिंग नीति?
तालिबान सरकार की इस्लामी बैंकिंग प्रणाली शरिया कानून के सिद्धांतों पर आधारित है। इस व्यवस्था में किसी भी प्रकार का ब्याज (सूद) लेना या देना पूरी तरह प्रतिबंधित है। इसे ‘रिबा’ कहा जाता है, जो इस्लामी कानून में वर्जित है। इस बैंकिंग सिस्टम में लाभ और हानि की साझेदारी के आधार पर वित्तीय लेन-देन होते हैं।
मुशारका और मुदारबा: इस्लामी बैंकिंग के दो मुख्य स्तंभ
इस्लामी बैंकिंग में मुख्यतः दो प्रकार की साझेदारी होती है। पहली है मुशारका जिसमें बैंक और ग्राहक मिलकर निवेश करते हैं और लाभ-हानि बराबर बाँटते हैं। दूसरी है मुदारबा जिसमें एक पक्ष पूँजी लगाता है और दूसरा पक्ष श्रम करता है। इस प्रकार का बैंकिंग सिस्टम पूरी तरह नैतिक और पारदर्शी माना जाता है।
दुनिया क्यों हुई तालिबान के इस मॉडल की फैन?
वर्ष २०२३ और २०२४ में जब वैश्विक वित्तीय संकट ने कई बड़े बैंकों को डुबोया, तब दुनिया के वित्त विशेषज्ञों की नज़रें इस्लामी बैंकिंग की ओर मुड़ीं। तालिबान सरकार की इस नीति के समर्थक मानते हैं कि ब्याज-मुक्त प्रणाली से आर्थिक असमानता कम होती है। मलेशिया, सऊदी अरब और यूनाइटेड अरब अमीरात जैसे देश पहले से ही इस्लामी बैंकिंग के क्षेत्र में आगे हैं और उनकी अर्थव्यवस्था काफी मजबूत रही है।
पाकिस्तान, बांग्लादेश और कई अफ्रीकी देशों में भी इस्लामी बैंकिंग की माँग तेज़ी से बढ़ रही है। यहाँ तक कि ब्रिटेन और अमेरिका जैसे देशों में भी इस्लामी बैंकिंग उत्पादों की ओर झुकाव बढ़ा है। यह इस बात का प्रमाण है कि दुनिया इस मॉडल की फैन होती जा रही है।
अफगानिस्तान में बैंकिंग क्षेत्र में बदलाव
तालिबान के सत्ता में आने के बाद अफगानिस्तान के केंद्रीय बैंक यानी ‘दा अफगानिस्तान बैंक’ ने सभी वित्तीय संस्थाओं को इस्लामी बैंकिंग नियमों का पालन करने का आदेश दिया। इसके तहत सभी बैंकों से ब्याज-आधारित खाते बंद करने को कहा गया। इस बदलाव ने अफगान आम जनता में मिश्रित प्रतिक्रिया उत्पन्न की, लेकिन कुछ व्यापारिक वर्गों ने इसे सकारात्मक कदम माना।
आलोचक क्या कहते हैं?
हालाँकि तालिबान सरकार की इस नीति की आलोचना भी हो रही है। अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) और विश्व बैंक जैसे संस्थान इस व्यवस्था को लेकर संशय में हैं। उनका मानना है कि बिना उचित नियामक ढाँचे के इस्लामी बैंकिंग टिकाऊ नहीं हो सकती। इसके अलावा अफगानिस्तान पर लगे अंतर्राष्ट्रीय प्रतिबंधों के कारण यह बैंकिंग सिस्टम वैश्विक वित्तीय बाज़ार से अलग-थलग है।
भारत के लिए सीख
भारत में भी इस्लामी बैंकिंग को लेकर समय-समय पर चर्चा होती रही है। भारतीय रिजर्व बैंक ने वर्षों पहले इस विषय पर एक समिति गठित की थी। हालाँकि इसे अभी तक लागू नहीं किया गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि दुनिया भर में इस्लामी बैंकिंग की बढ़ती लोकप्रियता को देखते हुए भारत को भी इस दिशा में गंभीरता से विचार करना चाहिए।
निष्कर्ष
तालिबान सरकार की इस्लामी बैंकिंग नीति चाहे जितनी विवादास्पद हो, लेकिन इसने वैश्विक वित्तीय जगत में एक नई बहस छेड़ दी है। ब्याज-मुक्त बैंकिंग सिस्टम की अवधारणा कोई नई नहीं है, लेकिन अफगानिस्तान जैसे युद्धग्रस्त देश में इसे लागू करने का प्रयास निश्चित रूप से ध्यान खींचता है। आने वाले वर्षों में यह देखना रोचक होगा कि यह मॉडल अफगानिस्तान की अर्थव्यवस्था को किस दिशा में ले जाता है।